जिसके मन आसक्ति समाये /
वैभव बाग़ देख बौराये //
सुफल कुफल दो फल बगिया में ,फलें कर्म जल सींचे /
शुभ फल लगें नित्य जो निज धन कर सत्कर्म उलीचे //
लगें अशुभ फल छल -बल से जब मन दूषित हो जाये /
जिसके ------------------------------ ------------------------//१//
नीति पंथ प्रिय तिन्हें न लागे धन की बढ़े पिपासा /
अहंकार के अन्धकार में दिखे न ज्ञान प्रकाशा//
हो मदान्ध उत्तम पद पाये और और ललचाये /
जिसके ------------------------------ -----------------//२//
क्रूर कर्म कर परधन छीने सबको तरस दिखाये /
दीन,हीन,निर्धन ,निर्बल पर दया भाव नहिं आये //
"मधुकर"वैभव मद के रस में माखी सा गड जाये /
जिसके ------------------------------ -----------------//३//
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