Friday, 19 August 2016















श्री मद्भागवत माहात्म्य

भागवत से ज्ञान और वैराग्य का तरुण होना  

शौनक  मुनि  जिज्ञासु   बन , गये   सूत  जी  पास /
मुनिवर   कथा   सुनाइये ,  हिय   जो   करे  उजास //

जिसके    सुनने   मात्र    से , उपजे   मन  अनुराग /
बसे   भक्ति   सबके   ह्रदय ,  जागें   ज्ञान ,  विराग // 

वह    साधन   बतलाइये  ,   जिससे   हो  कल्याण /
होहिं  समर्पित  ब्रह्म  में  , मन , आत्मा  अरु  प्राण //

कहा   सूतजी   ने    सुनो ,   शौनक   कथा सज्ञान /
मुझे   कहा   सुकदेव  ने , परम शिष्य  निज  जान //

पुरी   विशाला   में  हुआ  , निर्मल  ऋषि  सतसंग /
वहीं   हुआ   सनकादि  औ ,  नारदमुनि  का  संग //

पूछा   तब    सनकादि   ने , हे   नारद   मुनिराज /
चिंतित   और   उदास   क्यों, मुखमंडल  है  आज //

नारद     बोले     श्रेष्ठ    मैं ,  भूमण्डल   को  जान  /
चला  शान्ति  की खोज  में ,  घूमे   तीर्थ   महान  //

तीर्थराज  ,   गोदावरी  ,   काशी     तथा   प्रयाग /
कहीं शान्ति  दिखती नहीं, है  कलियुग का  राग //

हैं  कलियुग   के   कर्म   सब , श्रद्धा भाव  विहीन /
प्रजा   औ   पंडित  हैं  सभी, उदर  भरण  में लीन //

यमुना   जी   के   तीर   में,  है   वृन्दावन   धाम / 
जहाँ    रहे    श्रीकृष्ण  जी ,  तीर्थों   में   है  नाम //

वहाँ   गया   जब   तब  हुआ, मुझे  बड़ा आश्चर्य /
तरुणी   के   सँग   वृद्ध  दो , लख के  छूटा  धैर्य //

उसके  सँग  कुछ   नारियाँ , सेवा   में  थीं  लीन /
वे  देती  थीं  सान्त्वना , जब  हो दुख में दीन  //

गया   निकट   यह  पूछने , वृद्ध   तुम्हारे  कौन /
उत्तर    देने    के    लिये ,  उसने    तोडा   मौन //

वह  बोली  मैं  भक्ति  ये , मम सुत ज्ञान विराग /
गंगादिक  मम  संगिनी ,  रहतीं   स्थल  त्याग //  

ज्ञान   और   वैराग्य   को ,  करने   को  चैतन्य /
कुछ  उपाय  मुनिवर  करें , हो  जाऊँ  मैं  धन्य //

वेद  औ   गीता   शास्त्र  सब  मैंने  दिये  सुनाय /
पुत्र   न   जागे   भक्ति   के  चिंता   रही  सताय //

जब हरि का चिन्तन किया ,तब बोला आकाश /
सत्कर्म करो मिल संत से, होगा सफल  प्रयास //

नभ  वाणी  संकेत  सुन  ,  ढूँढ  रहा   हूँ   सन्त /
जो उन ज्ञान विराग के ,दुख  का   करदे  अन्त //  

कहा  सन्त  सनकादि  ने , मैं कहता  वह  मर्म /
जिसे   सुनाने   मात्र   से , हो   जाता   सत्कर्म //

उन्हें सुनाओ  भागवत , जिसमें  हरि का  वास /
वह  अमृत  के  तुल्य है,  जिसको  है   विश्वास //

उपनिषदों  का सार  यह ,  भक्तिभाव  से   पूर्ण /
अक्षय  रस , श्रीकृष्ण की ,  लीला   है  सम्पूर्ण //

जिसको सुन होंगे तरुण, फिरसे  ज्ञान, विराग /
बढ़  जायेगा  भक्ति  के, प्रति  मन में  अनुराग //

यह  मुकुन्दमकरन्दरस  मधुकर  करले  पान /
जन्म,मृत्यु दुखसिन्धु से, कृष्ण करें कल्यान //

                      डा.उदयभानु तिवारी मधुकर 
                      दत्त एवेन्यू फ्लैट न० ५०१ 
                      नेपियर टाउन जबलपुर 
     

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