श्री मद्भागवत माहात्म्य
भागवत से ज्ञान और वैराग्य का तरुण होना
शौनक मुनि जिज्ञासु बन , गये सूत जी पास /
मुनिवर कथा सुनाइये , हिय जो करे उजास //
जिसके सुनने मात्र से , उपजे मन अनुराग /
बसे भक्ति सबके ह्रदय , जागें ज्ञान , विराग //
वह साधन बतलाइये , जिससे हो कल्याण /
होहिं समर्पित ब्रह्म में , मन , आत्मा अरु प्राण //
कहा सूतजी ने सुनो , शौनक कथा सज्ञान /
मुझे कहा सुकदेव ने , परम शिष्य निज जान //
पुरी विशाला में हुआ , निर्मल ऋषि सतसंग /
वहीं हुआ सनकादि औ , नारदमुनि का संग //
पूछा तब सनकादि ने , हे नारद मुनिराज /
चिंतित और उदास क्यों, मुखमंडल है आज //
नारद बोले श्रेष्ठ मैं , भूमण्डल को जान /
चला शान्ति की खोज में , घूमे तीर्थ महान //
तीर्थराज , गोदावरी , काशी तथा प्रयाग /
कहीं शान्ति दिखती नहीं, है कलियुग का राग //
हैं कलियुग के कर्म सब , श्रद्धा भाव विहीन /
प्रजा औ पंडित हैं सभी, उदर भरण में लीन //
यमुना जी के तीर में, है वृन्दावन धाम /
जहाँ रहे श्रीकृष्ण जी , तीर्थों में है नाम //
वहाँ गया जब तब हुआ, मुझे बड़ा आश्चर्य /
तरुणी के सँग वृद्ध दो , लख के छूटा धैर्य //
उसके सँग कुछ नारियाँ , सेवा में थीं लीन /
वे देती थीं सान्त्वना , जब हो दुख में दीन //
गया निकट यह पूछने , वृद्ध तुम्हारे कौन /
उत्तर देने के लिये , उसने तोडा मौन //
वह बोली मैं भक्ति ये , मम सुत ज्ञान विराग /
गंगादिक मम संगिनी , रहतीं स्थल त्याग //
ज्ञान और वैराग्य को , करने को चैतन्य /
कुछ उपाय मुनिवर करें , हो जाऊँ मैं धन्य //
वेद औ गीता शास्त्र सब मैंने दिये सुनाय /
पुत्र न जागे भक्ति के चिंता रही सताय //
जब हरि का चिन्तन किया ,तब बोला आकाश /
सत्कर्म करो मिल संत से, होगा सफल प्रयास //
नभ वाणी संकेत सुन , ढूँढ रहा हूँ सन्त /
जो उन ज्ञान विराग के ,दुख का करदे अन्त //
कहा सन्त सनकादि ने , मैं कहता वह मर्म /
जिसे सुनाने मात्र से , हो जाता सत्कर्म //
उन्हें सुनाओ भागवत , जिसमें हरि का वास /
वह अमृत के तुल्य है, जिसको है विश्वास //
उपनिषदों का सार यह , भक्तिभाव से पूर्ण /
अक्षय रस , श्रीकृष्ण की , लीला है सम्पूर्ण //
जिसको सुन होंगे तरुण, फिरसे ज्ञान, विराग /
बढ़ जायेगा भक्ति के, प्रति मन में अनुराग //
यह मुकुन्दमकरन्दरस मधुकर करले पान /
जन्म,मृत्यु दुखसिन्धु से, कृष्ण करें कल्यान //
डा.उदयभानु तिवारी मधुकर
दत्त एवेन्यू फ्लैट न० ५०१
नेपियर टाउन जबलपुर

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