Saturday, 20 August 2016












सृष्टि का आदि एवं गीता सार 

कह   के  बन्दा  बात  ज्ञान  की , अन्तःकरण  जगायेगा /
हुआ नहीं  यदि  भोर  हृदय में कुछ भी समझ न आयेगा //

कौन  मूल  है  ब्रह्मा   का  भी, किसने  जगत   रचाया  है /
है  अनन्त ब्रह्माण्ड  ये  किसका ,अन्त  न  कोई  पाया है //

उस ईश्वर की छवि मनहारी, जिसमें  ध्यानी  खो जाता /
उसमें जो सुख पाता उसको ,फिर यह जगत नहीं भाता //

उन भावों के शब्द विहग , मधुकर मन में कलरव करते /
जब  आता  अनुराग  हृदय  में , पंक्तिबद्ध  होकर  झरते //

व्याप्त ब्रह्म जो कण कण में,अद्वैत,अलख नभ प्रतिछाया /
बनूँ  अनेक  एक  से  बढ़ ,संकल्प  किया  प्रकटी  माया //

क्षीरसिन्धु निर्माण किया, सत सगुन रूप में जब आया /
शेषनाग की सैया  पर ,श्री विष्णु रूप  निज  झलकाया //

हुये  चतुर्भुज , चक्रशुदर्शन , गदा , पद्म  औ शंख  लिये /
योग क्रिया विस्तारी रजगुण तमगुण को साकार किये //

करने जग विस्तार नाभि से,  नीरज एक निकल आया /
चतुर्मुखी  ब्रह्मा  ने  उस   पर,  अपने   को   बैठा  पाया //

कमलासीन  हुये  ब्रह्मा  के , मन में  यह  विचार  आया / 
मैं हूँ कौन और यह अम्बुज, निकल कहाँ से विकसाया //

चले खोजने मूल कमल का , उसका अन्त  नहीं  पाया /
तब आ बैठे पुनः कमल पर ,ध्यान भाव मन में आया // 

देखा ध्यान लगाकर नीरज , विष्णु  नाभ  से  आया है /
पाया यह  संकेत ध्यान में , जग हित तुम्हें  रचाया  है //

किया  सृष्टि  की  रचना  इससे , ब्रह्मा  सृष्टा  कहलाया /
कर्मों पर आधारित फल सब,निज रचना में वह लाया //

सत,रज,तम ये तीनों गुण में,उसकी अदभुत है माया /
 रहे  याद ना पूर्व जन्म की, इस कारण जग भरमाया //

योगेश्वर की  अमृत वाणी ,कर स्थिर चित सुन लेना /
अगर ईश में श्रद्धा है  तो, भाव सुमन कुछ चुन लेना //

सृष्टि  ईश  का  कम्प्यूटर  है, प्राणी  प्रोग्राम  उसका /
पूर्व  कर्म  ने  उसे बनाया , मन संचालक है तन का //

लिखा भाग्यमें जो प्राणी के,सुफल,कुफल वह पाता है /
और प्राप्त  करने  की इच्छा ,से  जग में , बँध जाता है //

इच्छायें  ही  बन्धन  हैं , मानव  से कर्म  कराती  हैं /
पूर्व कर्मफल पर आधारित, जग में मंच दिलाती  हैं // 

प्रोग्राम  प्राणी  में  है  जो , वह  बदला  ना  जायेगा /
चाहे जितना जोर लगाले , पिछले फल तो पायेगा //

नहीं दैव के वश में कुछ भी , मन फल का निर्माता है /
दैव  न  कोई दुःख  मिटाये , वह तो  भोग  प्रदाता है //

सुख पाने की चाहत तन से , जितने कर्म  करायेगी /
उतने ही गहरे ये मन  को , दुनिया  में  उलझायेगी //

करते जो  सत्संग  भजन में , अपना ध्यान लगाते हैं /
किन्तु भोग की इच्छाओं को,मन से त्याग न पाते हैं // 

वही स्वर्ग में जाकर देवों , के दुर्लभ  फल  पाते  हैं /
पुण्य क्षीण होते ही धरती , में वापस  गिर जाते हैं //

लेते हैं विश्राम यंहाँ अब आगे का कल पढ़ लेना /
मन में यदि जिज्ञासा है तो फिर संकेत हमें देना //


                                         उदयभानु तिवारी मधुकर 
                                          फ्लैट न ० ५०१ दत्त एवेन्यू 
                                          नेपियर टाउन जबलपुर 
                                          मो० ९४२४३२३२९७ 
       


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