कह के बन्दा बात ज्ञान की , अन्तःकरण जगायेगा /
हुआ नहीं यदि भोर हृदय में कुछ भी समझ न आयेगा //
कौन मूल है ब्रह्मा का भी, किसने जगत रचाया है /
है अनन्त ब्रह्माण्ड ये किसका ,अन्त न कोई पाया है //
उस ईश्वर की छवि मनहारी, जिसमें ध्यानी खो जाता /
उसमें जो सुख पाता उसको ,फिर यह जगत नहीं भाता //
उन भावों के शब्द विहग , मधुकर मन में कलरव करते /
जब आता अनुराग हृदय में , पंक्तिबद्ध होकर झरते //
व्याप्त ब्रह्म जो कण कण में,अद्वैत,अलख नभ प्रतिछाया /
बनूँ अनेक एक से बढ़ ,संकल्प किया प्रकटी माया //
क्षीरसिन्धु निर्माण किया, सत सगुन रूप में जब आया /
शेषनाग की सैया पर ,श्री विष्णु रूप निज झलकाया //
हुये चतुर्भुज , चक्रशुदर्शन , गदा , पद्म औ शंख लिये /
योग क्रिया विस्तारी रजगुण तमगुण को साकार किये //
करने जग विस्तार नाभि से, नीरज एक निकल आया /
चतुर्मुखी ब्रह्मा ने उस पर, अपने को बैठा पाया //
कमलासीन हुये ब्रह्मा के , मन में यह विचार आया /
मैं हूँ कौन और यह अम्बुज, निकल कहाँ से विकसाया //
चले खोजने मूल कमल का , उसका अन्त नहीं पाया /
तब आ बैठे पुनः कमल पर ,ध्यान भाव मन में आया //
देखा ध्यान लगाकर नीरज , विष्णु नाभ से आया है /
पाया यह संकेत ध्यान में , जग हित तुम्हें रचाया है //
किया सृष्टि की रचना इससे , ब्रह्मा सृष्टा कहलाया /
कर्मों पर आधारित फल सब,निज रचना में वह लाया //
सत,रज,तम ये तीनों गुण में,उसकी अदभुत है माया /
रहे याद ना पूर्व जन्म की, इस कारण जग भरमाया //
योगेश्वर की अमृत वाणी ,कर स्थिर चित सुन लेना /
अगर ईश में श्रद्धा है तो, भाव सुमन कुछ चुन लेना //
सृष्टि ईश का कम्प्यूटर है, प्राणी प्रोग्राम उसका /
पूर्व कर्म ने उसे बनाया , मन संचालक है तन का //
लिखा भाग्यमें जो प्राणी के,सुफल,कुफल वह पाता है /
और प्राप्त करने की इच्छा ,से जग में , बँध जाता है //
इच्छायें ही बन्धन हैं , मानव से कर्म कराती हैं /
पूर्व कर्मफल पर आधारित, जग में मंच दिलाती हैं //
प्रोग्राम प्राणी में है जो , वह बदला ना जायेगा /
चाहे जितना जोर लगाले , पिछले फल तो पायेगा //
नहीं दैव के वश में कुछ भी , मन फल का निर्माता है /
दैव न कोई दुःख मिटाये , वह तो भोग प्रदाता है //
सुख पाने की चाहत तन से , जितने कर्म करायेगी /
उतने ही गहरे ये मन को , दुनिया में उलझायेगी //
करते जो सत्संग भजन में , अपना ध्यान लगाते हैं /
किन्तु भोग की इच्छाओं को,मन से त्याग न पाते हैं //
वही स्वर्ग में जाकर देवों , के दुर्लभ फल पाते हैं /
पुण्य क्षीण होते ही धरती , में वापस गिर जाते हैं //
लेते हैं विश्राम यंहाँ अब आगे का कल पढ़ लेना /
मन में यदि जिज्ञासा है तो फिर संकेत हमें देना //
लेते हैं विश्राम यंहाँ अब आगे का कल पढ़ लेना /
मन में यदि जिज्ञासा है तो फिर संकेत हमें देना //
उदयभानु तिवारी मधुकर
फ्लैट न ० ५०१ दत्त एवेन्यू
नेपियर टाउन जबलपुर
मो० ९४२४३२३२९७

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